JEECUP Scam UP Polytechnic से जुड़े नए खुलासों ने उत्तर प्रदेश के Technical Education Department में हड़कंप मचा दिया है। Government Girls Polytechnic Lucknow और संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद यानी JEECUP के प्रशासनिक गलियारों से सामने आ रहे सनसनीखेज तथ्यों ने व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!महिला सशक्तिकरण और पारदर्शी प्रशासन के तमाम दावों के बीच यह मामला अब शासन के उच्च स्तर तक पहुंच चुका है।
JEECUP Scam UP Polytechnic: संजीव सिंह का दोहरा प्रभार और प्रशासनिक दखल
पूरे विवाद के केंद्र में राजकीय महिला पॉलिटेक्निक लखनऊ के प्रधानाचार्य और JEECUP Secretary Sanjeev Singh की कार्यप्रणाली है। विभागीय गलियारों में इस बात की तीखी चर्चा है कि उन्हें नियमों को दरकिनार करते हुए JEECUP Secretary का दोहरा प्रभार सौंपा गया। इतना ही नहीं, तकनीकी विशेषज्ञता न होने के बावजूद उन्हें Technical Cell का नोडल अधिकारी भी बनाए जाने के आरोप हैं।
सूत्रों के मुताबिक Sanjeev Singh का Retirement वर्ष 2027 के शुरुआती महीनों में प्रस्तावित है। ऐसे में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या उनके कार्यकाल समाप्त होने से पहले उनके दौर में हुए तमाम प्रशासनिक फैसलों और वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष जांच होगी। शासन स्तर पर विजिलेंस और EOW जांच की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।
मुख्य बिंदु और ताजा आंकड़े
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Dual Charge Controversy: एक ही अधिकारी के पास Principal और JEECUP Secretary के साथ टेक्निकल सेल का भी नोडल प्रभार।
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Audit Exemption Question: प्रवेश परीक्षा की शुचिता और गोपनीयता की आड़ में JEECUP Fund का स्वतंत्र ऑडिट न होने का गंभीर मुद्दा।
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Faculty Transfer Grid: Government Girls Polytechnic के महत्वपूर्ण एकल पदों (Single Posts) के स्टाफ को मूल संस्थान से हटाकर JEECUP में संबद्ध (Attached) किया जाना।
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Azamgarh Syndicate Link: पूर्व में BTEUP कार्यकाल के दौरान परीक्षा केंद्रों के आवंटन और निजी संस्थानों से जुड़े विवादों का इतिहास।
📊 Quick Fact-Check Table (त्वरित डेटा तालिका):
| विवरण बिन्दु | विभागीय तथ्य एवं दर्ज आरोप | वर्तमान प्रशासनिक स्थिति |
| मुख्य प्रकरण | JEECUP Scam UP Polytechnic एवं वित्तीय अनियमितताएं | विजिलेंस एवं EOW जांच की मांग |
| प्रमुख संबंधित अधिकारी | Sanjeev Singh (Secretary, JEECUP / Principal) | सेवानिवृत्ति 2027 के आरंभ में संभावित |
| प्रमुख प्रभावित संस्थान | Government Girls Polytechnic, Lucknow | शिक्षक एवं वार्डन की कमी, ढांचागत अभाव |
| संबद्धीकरण विवाद | एकल पदों के स्टाफ (Alok Ranjan, Pooja Saxena आदि) का अटैचमेंट | नियमों के उल्लंघन का आरोप |
| जांच एवं ऑडिट मांग | छात्र फीस मद, लग्जरी वाहन व फ्लाइट खर्च की स्वतंत्र जांच | शासन स्तर पर संज्ञान का इंतजार |
आजमगढ़ सिंडिकेट से पुराने संबंध और बैकग्राउंड टाइमलाइन
यह विवाद अचानक सामने नहीं आया है। Sanjeev Singh का प्रशासनिक दायरा पूर्व में भी चर्चाओं में रहा है। जब वे प्राविधिक शिक्षा परिषद यानी BTEUP के सचिव पद पर कार्यरत थे, तब परीक्षा केंद्रों के आवंटन और निजी पॉलीटेक्निक संस्थानों को कथित लाभ पहुंचाने के आरोप सामने आए थे। उस समय तत्कालीन प्रमुख सचिव श्रीमती राधा चौहान द्वारा उन्हें पद से हटाकर दूरस्थ संस्थान में स्थानांतरित किए जाने की कार्रवाई की गई थी।
आरोप है कि आजमगढ़ के कुछ निजी तकनीकी संस्थानों और सिंडिकेट संचालकों के साथ सांठगांठ का नेटवर्क अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। परीक्षा प्रणाली की आड़ में निजी कालेजों को अनुचित लाभ पहुंचाने और विभागीय संबद्धीकरण कराने के पीछे एक सुनियोजित नेटवर्क सक्रिय होने की बात कही जा रही है।
छात्राओं के फंड की विलासिता और बदहाल महिला पॉलिटेक्निक
दूर-दराज और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र-छात्राओं की फीस से JEECUP का फंड तैयार होता है। नियमानुसार इस धनराशि का उपयोग शिक्षण व्यवस्था के उन्नयन, महिला पॉलिटेक्निक की प्रयोगशालाओं, छात्रावासों और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए होना चाहिए।
इसके विपरीत, आरोप हैं कि इस फंड से अधिकारियों के लिए महंगी लग्जरी गाड़ियां, हवाई टिकट, महंगे मोबाइल और लैपटॉप जैसी सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। वहीं दूसरी तरफ Government Girls Polytechnic Lucknow में बुनियादी सुविधाएं, महिला शौचालय और हॉस्टल की स्थिति बदहाल बताई जा रही है। संस्था में कई प्रमुख शाखाओं में न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही स्थायी वार्डन।
एकल पदों पर तैनात महत्वपूर्ण कर्मचारियों जैसे आलोक रंजन, पूजा सक्सेना, विकल्प कुमार सिंह, प्रवीण कुमार और अशोक पाण्डेय को उनके मूल संस्थानों से हटाकर JEECUP में अटैच कर लिया गया है। इसके अलावा, इंटीरियर डिजाइन विभाग के विभागाध्यक्ष जितेंद्र मौर्य का मामला भी प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां बिना नियमित शिक्षण कार्य के वर्षों से वेतन आहरण के आरोप लग रहे हैं।
प्रदेश सरकार जहां जीरो टॉलरेंस और सुशासन की नीति पर काम कर रही है, वहीं तकनीकी शिक्षा विभाग में इस तरह के सिंडिकेट और संबद्धीकरण रैकेट पर लगाम लगाना प्रशासनिक प्राथमिकताओं में शामिल होना आवश्यक हो गया है। जब तक पूरे कार्यकाल का एक स्वतंत्र फोरेंसिक और वित्तीय ऑडिट नहीं कराया जाता, तब तक व्यवस्था में पारदर्शिता बहाल होना कठिन प्रतीत होता है।







