प्राविधिक शिक्षा विभाग में इन दिनों ‘ए पी सिंह’ नाम की एक ऐसी जादुई लीला चल रही है, जिसे देखकर बड़े-बड़े जादूगर भी अपनी टोपी उतारकर हाथ जोड़ लें। विभाग में नियम क्या हैं? कानून की व्याख्या कैसे होती है? और शासन की आपत्तियों को हवा में कैसे उड़ाया जाता है? इन सारे सवालों का अब पूरे विभाग में एक ही जवाब बचा है—‘आत्म प्रकाश सिंह’ (उप निदेशक/विभागाध्यक्ष)।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पिछले समाचारों में इनकी कारगुजारियों की परतें उघेड़ी गई थीं, लेकिन ताजा मामला तो हास्य, व्यंग्य और प्रशासनिक दुस्साहस का ऐसा अनूठा तालमेल है जिसे इतिहास में ‘स्व-सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण’ कहा जाएगा।
जब ‘ए पी सिंह’ बने अपने ही मुंसिफ और खुद को ही दिया क्लीन चिट!
कहानी इतनी हास्यास्पद और आंखें खोल देने वाली है कि शब्द भी चकरा जाएं:
-
ए पी सिंह उप निदेशक ने डीपीसी (DPC) का प्रस्ताव तैयार किया… ए पी सिंह विभागाध्यक्ष की सुविधा और सहूलियत के अनुसार!
-
ए पी सिंह ने नियमों को तोड़ा-मरोड़ा… सिर्फ और सिर्फ ए पी सिंह की कुर्सी और सहूलियत को महफूज करने के लिए!
-
जब शासन ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई, तो ए पी सिंह ने स्वयं उस आपत्ति का ‘परीक्षण’ किया और बड़े ही दयालु भाव से ए पी सिंह के पक्ष में ही उस आपत्ति को खारिज कर दिया!
-
फिर ए पी सिंह स्वयं वही प्रस्ताव लेकर बड़ी शान से शासन और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के दफ्तर पहुंचे और साबित करने की कोशिश की कि ए पी सिंह के पक्ष में नियमों की बलि चढ़ाना बिल्कुल सही है!
सरल शब्दों में कहें तो—जज भी ए पी सिंह, वकील भी ए पी सिंह, गवाह भी ए पी सिंह और फैसला भी ए पी सिंह का!
H3: मुख्य बिंदु और ताजा आंकड़े
-
AICTE का इनकार: अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) ने नियमों के विरुद्ध जाकर पक्ष में कोई भी सलाह देने से साफ मना कर दिया।
-
नकारात्मक रिपोर्ट का निस्तारण: AICTE की ओर से हरी झंडी न मिलने के बावजूद स्वयं ही नकारात्मक रिपोर्ट को दरकिनार कर फाइल आगे बढ़ा दी गई।
-
आयोग की अस्वीकृति: लोक सेवा आयोग ने नियमविरुद्ध प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना करते हुए वापस लौटा दिया।
-
रिक्त पदों की भरमार: विभाग में निदेशक, सहायक निदेशक, अपर निदेशक, संयुक्त निदेशक और 60% से अधिक प्रधानाचार्यों के पद खाली पड़े हैं।
📊 Quick Fact-Check Table (त्वरित डेटा तालिका):
| मुख्य बिंदु | विभागीय स्थिति / तथ्य |
| संबंधित अधिकारी | आत्म प्रकाश सिंह (उप निदेशक/विभागाध्यक्ष) |
| विभाग |
प्राविधिक शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश |
| विवाद का केंद्र |
डीपीसी प्रस्ताव, मनमाना परीक्षण व स्वयं को क्लीन चिट |
| AICTE का रुख |
नियमों के विरुद्ध जाकर सलाह देने से स्पष्ट इनकार |
| लोक सेवा आयोग |
नियमविरुद्ध प्रस्ताव को अस्वीकार कर वापस लौटाया |
| हाईकोर्ट का रुख |
मनमाने अटैचमेंट और खाली पदों पर कड़ी फटकार |
| रिपोर्टर |
अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार |
ए आई सी टी ई का ‘ना’ और ए पी सिंह का ‘स्वयं-निस्तारण’
जब शासन ने थोड़ा सा धर्म-संकट दिखाते हुए मामले में ए आई सी टी ई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) से विधिवत सलाह लेने को कहा, तो ए पी सिंह खुद ही ए आई सी टी ई के चौखट पर पहुंच गए। अब ए आई सी टी ई ठहरा नियमों और मानकों से बंधा संस्थान; उसने नियमों के विपरीत जाकर ए पी सिंह के पक्ष में कोई भी फर्जी सलाह या हरी झंडी देने से साफ इनकार कर दिया।
आम आदमी या कोई सीधा अधिकारी होता तो शर्म के मारे फाइल बंद करके बैठ जाता, लेकिन ‘ए पी सिंह’ तो आखिर ए पी सिंह हैं! जब ए आई सी टी ई ने मनमुताबिक रिपोर्ट नहीं दी, तो उन्होंने उस नकारात्मक रिपोर्ट का भी ‘स्वयं-निस्तारण’ कर डाला और फाइल को जबरन आगे बढ़ा दिया।
याद कीजिए इतिहास—अतीत में ए आई सी टी ई के नियमों के तहत प्रधानाचार्य और विभागाध्यक्ष का वेतन निर्धारण और डीपीसी तब तक रोक कर रखी जाती थी, जब तक ए आई सी टी ई हरी झंडी न दे दे। स्वयं माननीय विभागीय मंत्री भी ऐसे मामलों को तब तक रोके रखते थे जब तक कि नियमों की बाधा दूर न हो जाए। लेकिन धन्य हैं ए पी सिंह! जब बात इनकी अपनी कुर्सी और डीपीसी की आई, तो सारे नियम, परंपराएं, शुचिता और प्रशासनिक नैतिकता धरी की धरी रह गईं।
प्राविधिक शिक्षा का नया जादुई शो: जहाँ 13 साल के एम.टेक अधिकारी खोजता है विभाग!
‘नियम बने खिलौना’ शीर्षक से उजागर हुए इस खेल में हास्यास्पद स्थिति यह है कि प्राविधिक शिक्षा विभाग में हेड या प्रिंसिपल बनने के लिए 13 वर्ष की आयु वाले एम.टेक. और पीएचडी अधिकारी जैसी अजीबो-गरीब और असंभव शर्तें तय कर दी गईं। मकसद सिर्फ एक था—योग्य और वरिष्ठ लोग दौड़ से बाहर रहें और चहेतों का एकछत्र राज चले। नतीजा यह हुआ कि आज पूरा विभाग खाली पड़ा है, योग्य शिक्षक व अधिकारी हताश हैं और पूरी व्यवस्था लड़खड़ा चुकी है।
हाईकोर्ट की फटकार, आयोग की दुत्कार… फिर भी मंत्रीजी का दबाव ‘अपरम्पार’!
हाल ही में माननीय उच्च न्यायालय ने प्राविधिक शिक्षा विभाग की इस मनमानी पर जमकर फटकार लगाई है। कोर्ट ने तल्ख लहजे में साफ-साफ पूछा कि:
-
स्थाई नियुक्तियां करने के बजाय अपनी सुविधा के अनुसार ‘संबद्ध’ (अटैचमेंट) का जुगाड़ बैठाकर कामचलाऊ व्यवस्था क्यों चलाई जा रही है?
-
निदेशक के 2 पद क्यों खाली पड़े हैं?
-
सहायक निदेशक, अपर निदेशक और संयुक्त निदेशक जैसे अहम प्रशासनिक पद क्यों खाली हैं?
-
प्रधानाचार्य के 60% से अधिक पद और बोर्ड व जीकप (JEECUP) के सचिव पद किसके इशारे पर खाली रखे गए हैं?
सबूत इस बात के चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि लोक सेवा आयोग ने इनके प्रस्ताव को नियमविरुद्ध मानकर वापस लौटा दिया है, ए आई सी टी ई ने कोई छूट देने से इनकार कर दिया है, और शासन भी इनकी नियमावली की गलत व्याख्याओं से पूरी तरह असंतुष्ट है।
मंत्री जी का दबाव और सत्ता का नशा: जनता सब देख रही है!
इतनी भारी फजीहत, आयोग की दुत्कार, ए आई सी टी ई का इनकार और हाईकोर्ट की तीखी फटकार के बावजूद ऐसा लगता है कि माननीय मंत्री जी पर सत्ता का ऐसा नशा चढ़ा है कि जो काम नियम-कानून से न हो पाए, उसे अपने भारी दबाव से कराने पर आमादा हैं। मंत्री जी का यह ‘अदृश्य दबाव’ विभाग में वो सब करा रहा है जो कोई सोच भी नहीं सकता।
लेकिन हुक्मरान और उनके चहेते अधिकारी शायद यह भूल रहे हैं कि अभिमान चाहे कितना भी बड़ा हो, जनता और कानून की नज़र से छुपा नहीं रहता। कुर्सी और सत्ता का नशा स्थाई नहीं होता, लेकिन जनता का हिसाब स्थाई होता है।
अब विभाग के शोषित और पीड़ित अधिकारियों-कर्मचारियों की आखिरी उम्मीद केवल माननीय मुख्यमंत्री जी के दरबार से बंधी है। देखना यह है कि क्या मुख्यमंत्री जी इस ‘ए पी सिंह स्टाइल’ के स्व-निर्मित सर्कस पर कानून का बुलडोजर चलाकर न्याय करेंगे, या फिर नियमों को खिलौना बनाने का यह हास्यास्पद नाटक ऐसे ही चलता रहेगा?
— अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार





