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UP Technical Education Crisis: 80% पॉलिटेक्निक बिना प्रिंसिपल लावारिस!

UP Technical Education Crisis आज उत्तर प्रदेश के लाखों डिप्लोमा छात्रों और युवाओं के भविष्य के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। तकनीकी शिक्षा को वैश्विक पहचान दिलाने के तमाम दावों के बीच प्राविधिक शिक्षा विभाग जमीनी स्तर पर पूरी तरह प्रशासनिक पंगुता का शिकार हो चुका है।

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वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी की बेबाक पड़ताल के अनुसार, एक पढ़े-लिखे और इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले कैबिनेट मंत्री के अधीन चलने वाले इस विभाग का प्रशासनिक और अकादमिक प्रदर्शन धरातल पर शून्य नजर आ रहा है। शीर्ष प्रशासनिक पदों से लेकर क्लासरूम तक व्यवस्था अवैध जुगत और कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे रेंग रही है।

UP Technical Education Directorate में प्रशासनिक असंतुलन और जूनियर अफसरों का राज

निदेशालय स्तर पर प्रशासनिक पदानुक्रम पूरी तरह ध्वस्त नजर आता है। शासन स्तर से जो कार्यवाहक निदेशक तैनात किए गए हैं, उनका आधिकारिक ग्रेड पे वहां पहले से कार्यरत उपनिदेशक, सहायक निदेशक, प्रधानाचार्य और संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारियों से भी कम है।

प्रशासनिक नियमों के अनुसार कम ग्रेड पे वाला अधिकारी उच्च ग्रेड पे वाले वरिष्ठ अफसरों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख सकता। जांच रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रशासनिक शून्यता का फायदा उठाकर मंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारी श्री आत्म प्रकाश सिंह के हाथों पूरी व्यवस्था संचालित हो रही है, जहां कार्यवाहक निदेशक केवल औपचारिक हस्ताक्षर तक सीमित होकर रह गए हैं।

मुख्य बिंदु और प्रशासनिक आंकड़े

  • प्रधानाचार्यों का अकाल: 80% राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थानों में पूर्णकालिक प्रिंसिपल नहीं हैं; केवल 20% संस्थानों में स्थायी मुखिया तैनात हैं।

  • अनुदानित संस्थानों का संकट: सहायता प्राप्त (Aided) पॉलिटेक्निक संस्थानों में स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 10% शिक्षक ही कार्यरत हैं।

  • बड़ी संस्थाएं खाली: BTEUP और JEECUP जैसी परीक्षा व प्रवेश संस्थाएं बिना स्थायी निदेशक और सचिव के चल रही हैं।

  • अतिरिक्त प्रभार का बोझ: एक-एक प्रशासनिक अधिकारी पर 150 से 200 संस्थानों की मॉनिटरिंग और फाइलों का प्रभार थोप दिया गया है।

  • अवैध अटैचमेंट: शिक्षण कार्य से जुड़े शिक्षक संस्थानों से दूर मुख्यालयों और निदेशालयों में अटैचमेंट कराकर मजे काट रहे हैं।

📊 Quick Fact-Check Table: प्राविधिक शिक्षा विभाग का वर्तमान ढांचा

प्रशासनिक/अकादमिक स्तर आधिकारिक स्थिति प्रभाव व जमीनी हकीकत
राजकीय पॉलिटेक्निक प्रधानाचार्य 80% पद रिक्त (कार्यवाहक भरोसे) प्रशासनिक और अकादमिक मॉनिटरिंग ठप
अनुदानित पॉलिटेक्निक शिक्षक 90% पद खाली (केवल 10% कार्यरत) 3-4 शिक्षकों के भरोसे 6-8 इंजीनियरिंग ब्रांच
BTEUP एवं JEECUP स्थायी सचिव व निदेशक नदारद परीक्षा, परिणाम और काउंसिलिंग प्रभावित
MMIT संस्थान IT ब्रांच पूरी तरह गायब सूचना प्रौद्योगिकी का मुख्य उद्देश्य अधूरा
IRDT संस्थान R&D विंग निष्क्रिय केवल औपचारिक फाइलों तक सीमित व्यवस्था

BTEUP और JEECUP में सिंडिकेट का प्रभाव: नियमों को ताक पर रखकर मनचाहे प्रभार

UP Technical Education Crisis के मूल में शीर्ष पदों पर स्थायी अधिकारियों की नियुक्ति न होना है। प्राविधिक शिक्षा परिषद (BTEUP), जो प्रदेशभर के पॉलिटेक्निक छात्रों के पाठ्यक्रम, परीक्षा और प्रमाण पत्रों का संचालन करती है, वह स्थायी सचिव और निदेशक के बिना कार्यवाहक व्यवस्था पर टिकी है। यही हाल संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद (JEECUP) का भी है।

विभागीय नियमावली (Service Rules) को जानबूझकर वर्षों से लंबित रखने के आरोप सामने आ रहे हैं ताकि मनचाहे अटैचमेंट और अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था जारी रहे। नियमानुसार प्रधानाचार्य का पद रिक्त होने पर संस्थान के वरिष्ठतम प्रथम श्रेणी अधिकारी को प्रभार मिलना चाहिए, लेकिन नियमों को दरकिनार कर पसंदीदा अफसरों को 80 किमी दूर के संस्थानों का दोहरा प्रभार सौंपा जा रहा है।

MMIT और IRDT की दुर्दशा: युवाओं के तकनीकी भविष्य से खिलवाड़

महामाया सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (MMIT) का गठन प्रदेश में मॉडर्न आईटी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। कड़वी हकीकत यह है कि इन संस्थानों में आईटी की मूल ब्रांच ही संचालित नहीं हो रही है। दूसरी ओर शोध, विकास एवं प्रशिक्षण संस्थान (IRDT) से रिसर्च और डेवलपमेंट पूरी तरह गायब हो चुका है।

पॉलिटेक्निक संस्थानों में जब 3 से 4 शिक्षकों के सहारे पूरी-पूरी संस्था चल रही हो, तो उद्योगों की मांग के अनुसार स्किल्ड इंजीनियर तैयार करना असंभव साबित हो रहा है। महिला पॉलिटेक्निक संस्थान भी संसाधनों और स्टाफ के भारी अभाव से जूझ रहे हैं।

लाखों छात्रों का भविष्य तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, लेकिन स्थायी नीति और पारदर्शी नियुक्तियों के अभाव में विभाग बुनियादी समस्याओं में फंसा हुआ है। जब तक शासन स्तर पर इन विसंगतियों पर सख्त कदम नहीं उठाए जाते, तब तक तकनीकी विकास के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की यह खाई पटती नजर नहीं आती।

विशेष इनसाइड रिपोर्ट: अनिल तिवारी, वरिष्ठ एवं बेबाक पत्रकार

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