उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर चहेते अधिकारियों को उपकृत करने का एक गंभीर मामला सामने आया है। विभाग के भीतर मचे इस प्रशासनिक घमासान से शिक्षा जगत और शासन दोनों में खलबली मच गई है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!दैनिक कामकाज से लेकर तबादलों तक में विभागीय मंत्री की विशेष कृपा का दावा किया जा रहा है। कंप्यूटर विभागाध्यक्ष आत्म प्रकाश सिंह की कार्यशैली और अटैचमेंट को लेकर अधिकारियों में गहरा असंतोष पनप रहा है।
प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों की अनदेखी और अटैचमेंट का खेल
विभागीय गलियारों में चर्चा है कि प्राविधिक शिक्षा विभाग के भीतर एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय हो चुका है। इस व्यवस्था के चलते पसंदीदा चेहरों को मनचाही संस्थाओं का अतिरिक्त प्रभार और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) बांटे जा रहे हैं।
साधारण शिक्षकों और कर्मियों को नियमों का पाठ पढ़ाया जाता है, वहीं रसूखदार अधिकारियों के लिए सारे नियम शिथिल कर दिए जाते हैं।
निदेशालय स्तर पर होने वाले प्रशासनिक निर्णयों में एक ही अधिकारी का दबदबा देखने को मिल रहा है। इस व्यवस्था के कारण पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।
अधिकारी का नाम: आत्म प्रकाश सिंह (विभागाध्यक्ष, कंप्यूटर)
प्रमुख आरोप: अवैध अटैचमेंट, 1 वर्ष में PhD और नियमों के विपरीत पदोन्नति
विभागीय प्रभाव: कानपुर और लखनऊ के मुख्य कार्यालयों में लगातार तैनाती
मूल मांग: मुख्यमंत्री स्तर से निष्पक्ष जांच और वित्तीय ऑडिट
डिग्री से लेकर तैनाती तक: सवालों के घेरे में पूरी टाइमलाइन
श्री सिंह के शैक्षणिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड पर नजर डालें तो कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आते हैं। जब अन्य कर्मियों को सामान्य अवकाश मिलना मुश्किल था, तब इन्हें एमएनआईटी से पूर्ण वेतन पर एमटेक की अनुमति दी गई।
इसके बाद महर्षि विश्वविद्यालय से पार्ट टाइम पीएचडी को लेकर भी विवाद गहरा गया है। दावा है कि 2019 में शुरू हुए कोर्स को उन्होंने मात्र एक साल के भीतर 2020 में ही पूरा कर लिया।
स्थानांतरण नीति के मुताबिक किसी भी अधिकारी की निदेशालय या आईआरडीटी कानपुर में अधिकतम तैनाती 3 वर्ष हो सकती है। इसके विपरीत, इस अधिकारी को कई बार इन्हीं प्राइम लोकेशंस पर पदस्थापित किया गया।
एनईपी के तहत सिलेबस निर्माण के दौरान हुई भारी लापरवाही का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ा था। परीक्षा के समय टाइम टेबल में अचानक बदलाव करना पड़ा, फिर भी कोई जवाबदेही तय नहीं की गई।
पदोन्नति की अर्हता और प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा असर
शासनादेशों के अनुसार प्रधानाचार्य पद की डीपीसी के लिए न्यूनतम 16 वर्ष का शिक्षण अनुभव अनिवार्य माना जाता है। सूत्रों का कहना है कि महज 9 वर्ष का अनुभव होने के बावजूद उक्त अधिकारी का नाम डीपीसी सूची में शामिल किया गया।
इस प्रकार की मनमानी से प्राविधिक शिक्षा विभाग के निष्पक्ष और वरिष्ठ शिक्षकों में भारी निराशा है। दूर-दराज के जनपदों में सेवाएं दे रहे शिक्षकों का मानना है कि प्रतिभा की जगह व्यक्तिगत पहुंच को तरजीह दी जा रही है।
विशेष टेक्निकल सेल के नाम पर किए जा रहे प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों पर भी सवालिया निशान हैं। इससे न केवल सरकारी खजाने पर असर पड़ता है, बल्कि छात्रों को मिलने वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी प्रभावित होती है।
मुख्यमंत्री से निष्पक्ष जांच की मांग और आगे का रास्ता
शिक्षा तंत्र को कमजोर कर रहे इस गठजोड़ के खिलाफ अब खुलकर आवाज उठने लगी है। निष्पक्ष अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीधे हस्तक्षेप की गुहार लगाई है।
विभागीय शिक्षकों की मांग है कि लखनऊ और कानपुर में जमे तमाम अवैध संबद्धीकरण तत्काल प्रभाव से रद्द किए जाएं। सभी अधिकारियों को उनके मूल शिक्षण संस्थानों में भेजा जाना चाहिए ताकि छात्रों को उनके ज्ञान का लाभ मिले।
अब सबकी निगाहें शासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे नेटवर्क की विशेष ऑडिट होगी। यदि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो विभाग में असंतोष और अधिक गहरा सकता है।






